बोधकथा | धीरज का फल | Good Thoughts In Hindi On Life | Sunder Vichar

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बोधकथा | धीरज का फल | Good Thoughts In Hindi | Sunder Vichar

एक संत थे… हमेशा भगवान की भक्ति में लीन रहते थे… उनकी भगवान पर बहुत श्रध्दा थी.

अपनी भक्ति में इतने डूबे रहते की उन्हें ना अपना होश रहता और नाही आजूबाजू का…

जब वह रोड से चलते थे तो, उन्हें देखने के लिए काफी भीड़ जमा हो

जाती थी. और जहां रुकते वहीं लोग इकट्ठा हो जाते…

उनके दर्शन करने भी काफी भीड़ लग जाती थी. उनके चेहरे पे

एक अलग ही आध्यात्मिक तेज था.

संत श्री नित्य सुबह चार बजे के आसपास घुमने निकल जाते थे

और भगवान की भक्ति के धुन मे ही रहते थे…!

रोज की तरह एक दिन जब सुबह के समय संत श्री अपनी मस्ती में

भगवान के ध्यान में झुमते हुए रास्ते से चल रहे थे तभी उनकी नजर

एक देवदुत पर पड़ी और उस देवदूत के हाथ में एक डायरी थीं…!

संत ने देवदूत को रोककर पूछा… आप यहाँ क्या कर रहे हैं…!

और इस डायरी में क्या है…? देवदूत ने जवाब दिया की इस डायरी में

उन लोगों के नाम है जो भगवान को याद करते है…!

यह सुनकर संत श्री की भी इच्छा हुई की, डायरी में उनका नाम है या नहीं…

उन्होंने पुछ ही लिया की… क्या मेरा भी नाम इस डायरी में है…?

देवदूत ने कहा की आप स्वयं ही देख लीजिए और देवदूत ने डायरी संत श्री को दे दी.

संत ने डायरी खोलकर देखी तो उनका नाम उस डायरी भी कही नहीं था…!

इस पर संत श्री थोड़ा मुस्कराये और फिर वह अपनी भक्ति में लीन होकर

भगवान को याद करते हुए वहा से निकल गए…

दूसरे दिन भी फिर वही देवदूत संत श्री को दिखाई दिया, लेकिन इस बार संत श्री ने

उसकी तरफ ध्यान नहीं दिया और अपनी भक्ति की धुन में चल दिये…

इतने में ही देवदूत ने कहा… संत श्री आज आप डायरी नहीं देखोगे क्या…?

इस पर संत श्री ने मुस्कुराते हुए कहा… आप की इच्छा है तो… दिखा दो

और जैसे ही देवदूत ने डायरी खोलकर देखा तो… उस डायरी में सबसे ऊपर

संत श्री का ही नाम था…!

इस पर संत श्री हँस दिए और बोले… क्या भगवान भी अलग अलग डायरी रखते

हैं क्या…? कल तो डायरी में मेरा नाम ही नहीं था… और आज इस डायरी में मेरा

नाम  सबसे ऊपर है…!

इस पर देवदूत ने कहा की… संत श्री आप ने जो डायरी कल देखी थी… उसमे जो

नाम थे, वो भगवान से प्यार करते हैं…! और आज आपने जो ये डायरी देखी हैं…

इसमें उन लोगों के नाम है… जिनसे भगवान स्वयं प्यार करते हैं…!

बस…! संत श्री इतना सुनते ही, जोर जोर से रोने लगे… और काफी देर तक सर को

झुकाकर वही पड़े रहे, और रोते हुए कहने लगे की… हे प्रभु… अगर मै आप के

ऊपर कल थोड़ा सा भी अविश्वास कर लेता तो… हे प्रभु… मेरा नाम कही भी

नहीं होता.

पर मेरे थोड़े से धीरज रखने का, मुझ अभागे को इतना बड़ा पुरस्कार दिया आपने…!

सच में बहुत दयालु हों… आपसे बड़ा कोई नहीं प्यार करने वाला प्रभु…!

और लगातार रोते रहें…

 

मित्रों… भगवान की भक्ति में आखिर तक लगे रहो…

और धीरज रखो, क्योंकि…

जब भी भगवान की कृपा होने का समय आएगा

तब… हमारा मन अधीर होने

लगेगा… लेकिन हमें वहा लगें रहना है…

जिससें प्रभु हम पर भी कृपा करें…!

धीरज का फल मीठा होता है…!

मुस्कुराहट  भी… एक प्रार्थना है…

दिया भी कीजिए… और लिया कीजिए.

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