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Sunder Vichar | लोगों के घरों में अंधे बनकर जाओ | Suvichar

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Sunder Vichar – लोगों के घरों में अंधे बनकर जाओ
और वहां से गूंगे बनकर निकलो – Suvichar

जय श्री कृष्णा

दो सहेली की अचानक बाजार में खरेदी करते हुए मुलाकात होती है…
पहिली सहेली – बड़ी प्यारी बच्ची है… किसकी है..?
दूसरी सहेली – मेरी बेटी है…
पहिली सहेली – अरे तू माँ बन गई…. congrats…
वैसे इस बच्ची के जन्म की खुशी में तुम्हारे
पति की और से तुम्हे क्या उपहार मिला…?
दूसरी सहेली – कुछ नहीं दिया…
पहिली सहेली – क्या बात करती हो…! तुम्हारे पति की नजरों में
तुम्हारी कोई कीमत नहीं…? ये अच्छी बात नहीं है…

शब्दोँ का जहरीला बम गिराकर अपनी सहेली को चिंता में डालकर
निकल गई.

दूसरी सहेली बाज़ार से कुछ भी ना खरीदें घर आ गई.
कुछ देर बाद उसका पति घर आया तो देखा पत्नी का चेहरा
उतरा हुवा है,

उसने जानना चाहा तो दोनों में झगडा हो गया नौबत तलाक तक आ गई
और अंत में तलाक हो हि गया.

Sunder Vichar | लोगों के घरों में अंधे बनकर जाओ

जानते हो समस्या की सुरुवात कहा से हुई…? उस बेकार से सवाल से…
जो उस सहेली ने पूछा था…!

अजय ने अपने खास मित्र किशोर से पूछा,
कैसे हो और क्या कम चल रहा है…?
किशोर – ठीक हूँ… वो पुरानीं कंपनी में ही काम चालू है…
अजय – ठीक है, अभी कितनी पगार दे रहा है मालक..?
किशोर – 20,000 रूपये
अजय – सिर्फ 20,000 रूपये…!
इतने कम पैसो में कैसे गुजरा कर लेते हो…?

किशोर – ( गहरी सांस खींचते हुए ) – क्या बताऊं यार…
बस कट रही है जिंदगी… मुलाकात ख़त्म हुई,
दोनों अपने – अपने रस्ते निकल गए….
लेकिन किशोर का मन अब अपने काम में नहीं लग रहा था,
और उसने कुछ दिनों बाद सीधे अपने मालिक से पगार
बढ़ाने की बात की और मालक ने साफ़ मना कर दिया.
किशोर ने जॉब छोड़ दिया… और बेरोजगार हो गया.

Sunder Vichar | लोगों के घरों में अंधे बनकर जाओ

पहले उसके पास एक नौकरी थी… अब नौकरी नहीं रही.

एक बुजूर्ग दम्पति का बेटा परिवार के साथ उसी शहर में
किराये से रहता था, क्योकि उसका घर छोटा था और
ऑफिस भी दूर पड़ता था.

एक पहचान के साहब ने उस बुजुर्ग दम्पति से कहा…
आपका बेटा आपसे बहुत कम मिलने आता है…?
क्या उसे आपकी कोई चिंता नहीं, और प्रेम भी नहीं…?

माँ ने कहा – ऐसा कुछ नहीं है, मेरा बेटा अपने काम में
ज्यादा व्यस्त रहता है, और उसका भी परिवार है,
उन्हें भी वक़्त देना पड़ता है.

वो साहब बोला – वाह…! यह क्या बात हुई भाभीजी,
तुमने उसे पाल पोसकर बड़ा किया, उसकी हर इच्छा
आपने पूरी की, अब आपके बुढ़ापे में उसको व्यस्तता से
आप लोगो से मिलने का भी समय नहीं मिल रहा है…?
ये कुछ नहीं, ना मिलने का बहाना है.

इस बातचीत के बाद माँ – बाप के मन में बेटे के प्रति शंका
पैदा हो गई…. अब उनका बेटा जब भी मिलने आता तो,
उसके माँ बाप यही सोचते रहते की, बेटे के पास सबके लिए
समय है… सिर्फ माँ-बाप के लिए नहीं है…!

Sunder Vichar | लोगों के घरों में अंधे बनकर जाओ

हमेशा याद रखिए जुबान से निकले हुए शब्द, दूसरे पर बहुत ही
गहरा असर डाल देते हैं. बेशक कुछ लोगों के मुह से जहरीले
बोल निकलते हैं…

हमारी प्रतिदिन की ज़िंदगी में बहुत से सवाल हमें, बहुत ही मासूम
लगते हैं…
जैसे – तुमने यह क्यों नहीं खरीदा…?
तुम्हारे पास यह क्यों नहीं है…?
इस इंसान के साथ तुम पूरी जिंदगी कैसे चल सकती हो…?
उसे तुम कैसे मान सकते हो…? वगैरा वगैरा….

इस तरह के बेकार और बेमतलबी के सवाल, या तो नादानी में
या बिना मकसद के हम पूछ बैठते हैं…! जबकि हम यह भूल जाते हैं कि
हमारे ये सवाल सुनने वाले के दिल में नफरत या मोहब्बत का कौन सा बीज
बो रहे हैं.

आज के इस दौर में हमारे आजू – बाजु, हमारा समाज या घरों में जो तनाव
बढ़ते जा रहे है, उनकी जड़ तक जाया जाए तो अक्सर उसके पीछे किसी
और का हाथ होता है.

वो ये नहीं जानते की, नादानी में या जानबूझकर बोले जाने वाली हमारी बकवास
से किसी की ज़िंदगी को तबाह हो सकती है…! ऐसी जहरीली हवा फैलाने वाले
हम ना बनें.

लोगों के घरों में अंधे बनकर जाओ और वहां से गूंगे बनकर निकलो.

जय श्री कृष्णा

हिंदी प्रेरणादायक कहानी | इनकार | Hindi Motivational Story

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हिंदी प्रेरणादायक कहानी | इनकार | Hindi Motivational Story

 

किसी के भी इंकार को हमेशा उसकी कठोरता मत समझो

बहुत बड़ी एक नदी के किनारे दो विशाल पेड़ थे…
उसी नदी के किनारे से एक चिड़िया अपने बच्चो के साथ
जा रही थी…

उसे वो जगह रहने के के लिए काफी उत्तम लगी…!
चिड़िया थोडे समय वही रुकी.
और कुछ विचार करके पहले पेड़ के पास गई…

पेड़ से पूछा… कुछ ही दिनों में बारिश का मौसम आने वाला है…
क्या मैं अपने बच्चो के साथ तुम्हारे डाली में घोसला बनाकर
रह सकती हूँ…?
लेकिन उस पहले वाले विशाल पेड़ ने साफ़ मना कर दिया…

हिंदी प्रेरणादायक कहानी

चिड़िया फिर दूसरे पेड़ के पास गई और वही विनती की…
दूसरा पेड़ झटसे मान गया. चिड़िया अपने बच्चों के साथ
खुशी-खुशी दूसरे पेड़ में घोसला बना कर रहने लगी…

एक दिन बहुत तेज बारिश हुई… इसी तेज बारिश में पहले वाला पेड़
जड़ से उखड़ कर पानी मे बहने लगा… जब चिड़िया ने अपने घोसले से
उस पेड़ को बहते हुए देखा तो कहने लगी…

हिंदी प्रेरणादायक कहानी | इनकार | Hindi Motivational Story

जब तुमसे मैने अपने बच्चे के लिए आसरा माँगा था…
तब तुमने मना कर दिया था, अब देखो तुम्हारे
उसी कठोर रूखे व्यवहार की सजा तुम्हे मिल रही है.

बहते हुए पेड़ ने चिड़िया को मुस्कुराते हुए कहा…
मै अच्छी तरह से जनता था की मेरी जड़ें बहुत
कमजोर है. और इस बारिश में नहीं टिक पाऊंगा,
मैं तुम्हारी और तुम्हारे बच्चे की जान खतरे में
नहीं डालना चाहता था, इसिलिए मैंने मन किया था.
मना करने के लिए मुझे क्षमा कर दो,
और ये कहते-कहते पेड़ बह गया…

दोस्तो…!

किसी के भी इंकार को हमेशा उसकी कठोरता मत समझो
क्या पता उसके उसी इंकार से आपकी भलाई छुपी हो…!
कौन किस परिस्थिति में है शायद हम नहीं समझ पाएं…!

इसलिए किसी के चरित्र और शैली को
उसके वर्तमान व्यवहार से ना तौलें…

हिंदी प्रेरणादायक कहानी | इनकार | Hindi Motivational Story

धन्यवाद

महिलाओं के प्रति सम्मान पैदा करने वाले सुंदर विचार | Women’s

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तकलीफ-मीट-गई-women-quotes-hindi-महिला-पर-सुंदर-सुविचार-हिंदी-में
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महिलाओं के प्रति सम्मान पैदा करने वाले सुंदर विचार | Women’s Day 

चैन से मर भी नहीं सकती – महिला दिवस विशेष

शाम होने लगी थी और सरिता अपने किचन में रात के खाने की
तैयारी में लगी थी…! तभी अचानक उसके सिर में जोर का दर्द उठा,
मानो सिर दर्द से फट ही जायेगा…

थोड़ी देर बाद दर्द कम हो गया और सरिता अपने आप से ही कहने लगी की
इतना दर्द तो महिलाएं चाय में ही घोलकर पी जाती हैं.
ये कहकर वह अपने काम में लग गई. रात का खाना बनाया,

पती के आने पर साथ में खाना खाया, अपने सारे काम निपटाकर
सोने को आई तो, अपने सिर दर्द के बारे में पति को बताया,

पति ने सिर दर्द की गोली देकर आराम करने को कहा…
साथ ही तुम ज़्यादा काम करती हो, अपनी तबियत की तरफ
बिलकुल भी ध्यान नहीं देती हो… ये बात बोलकर मीठी सी
डाट भी लगाई.

सरिता ने भी काम कम करने का और अपनी सेहत की तरफ
ध्यान रखने का पति से वादा कर के सो गयी. आधी रात को
अचानक सिर दर्द फिर बढ़ गया था…! सर में बहुत दर्द हो रहा था.
अभी सिर फटकर दो टुकड़े हो जायेंगे. इतनी तकलीफ हो रही थी,
“कहीं ये ब्रेन हेमरेज तो नहीं…!” ये विचार सरिता के मन में आते ही…
वह पसीने से लथपथ हो उठी.

“हे भगवान…! हरी सब्जी ठीक से फ्रिज में नहीं रखी है, मेथी – पालक को
साफ भी नहीं किया, गाजर नहीं धोये, मटर फल्ली भी छीलने की बाकि है,
फ़्रीज़ में मलाई का कटोरा भी पूरा भरा रखा हुआ है, आज मुझे मक्खन
निकाल लेना चाहिए था. अगर मै ब्रेन हेमरेज से मर जाती हूँ तो,

मेरे मरने पे आने वाले मेरे रिश्तेदार क्या कहेंगे, मेरे बारे में क्या सोचेंगे,
बाहर इतनी साफ़ रहती है, और फ्रिज को कितना गन्दा कर के रखा है,
कपडे भी ऐसे ही पड़े है,

उन्हें भी प्रेस नहीं किया, नाहीं प्रेस करने के लिए लांड्री में डाले,
दाल भी खत्म हो गयी है, मुझे किराना दुकान से राशन भी ला लेना
चाहियें था.

मेरी मृत्यु हो जाने पर मेरे घर पर, तेरह दिन तक जो सगे – संबंधि रुकेंगे,
वो लोग तो मेरे कुप्रबंध की बाते करेंगे,

कहेंगे सरिता को तो घर सँभालते ही नहीं आता था.
अब सरिता अपने सिर का दर्द भूलकर काल्पनिक अपमान के दर्द को
महसूस करने लगी.
नहीं भगवान…! कृपा करके आज मुझे मृत्यु मत देना…! आज मै मरने के लिए
तैयार नहीं हु, और नाही मेरा घर…!

भगवान से यही प्रार्थना करते – करते सरिता गहरी नींद में सो गई.
सुबह उठी और अपने रोज के काम में लग गई.

महिलाओं के प्रति सम्मान पैदा करने वाले सुंदर विचार

सुंदर विचार

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तुम अपनी अच्छाइयों को ढूंढो….
बुराई निकालने के लिए लोग है.

तुम अपनी विशेषता ढूंढो….
कमीया निकालने के लिए लोग है.

अगर रखना ही है कदम तो….
आगे रखों….
पीछे खींचने के लिए लोग है.

सपने देखते ही हो तो….
ऊंचे देखो……
नीचा दिखाने के लिए लोग है.

अपने अंदर तुम जुनून की
चिंगारी भड़काओ….
जलने के लिए तो लोग हैं. 

सुंदर विचार

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कल-को-खो-दिया-women-quotes-hindi-महिला-पर-सुंदर-सुविचार-हिंदी-में

कल को खो दिया आज के लिए
आज को खो दिया कल के लिए
कभी भी जी नया सके हम आज
आज के लिए.
बीत रही है जिंदगी कल – आज –
एयर कल के लिए.

सुंदर विचार

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जिंदगी मे टेंशन ही टेंशन है….
फिर भी इन ओठों पे मुस्कुराहट हैं.
क्योंकि जब जीना हर हाल मे है….
तो मुस्कुराके जीने में क्या नुकसान है.

सुंदर विचार

मन-की-शांति-women-quotes-hindi-महिला-पर-सुंदर-सुविचार-हिंदी-में
मन-की-शांति-women-quotes-hindi-महिला-पर-सुंदर-सुविचार-हिंदी-में

मन की शांति से बढ़कर
इस दुनिया में कोई बड़ी
दौलत नहीं हैं.

Happy Women’s Day | जागतिक महिला दिनाच्या हार्दिक शुभेच्छा

एकादसी, व्रत, जानकारी, पूजन, सूची | All Ekadashi’s Name List

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एकादसी व्रत, जानकारी, पूजन, सूची | All Ekadashi’s Name List

हर महिने में शुक्ल पक्ष कि एक एकादशी और कृष्ण पक्ष की एक एकादशी
इस प्रकार महिने कि दो एकादशी और वर्ष में चौबीस एकादशी आती है.
अगर अधिक मास हो तो दो एकादशी बढ जाती है.

इस तिथि को ग्यारस भी कहते ही. महीने की दो एकादशी में
एक शुक्लपक्ष के बाद आती है. और एक कृष्णपक्ष के बाद.

अमावस्या के बाद आनेवाली एकादशी को शुक्ल पक्ष की एकादशी कहते हैं
और दूसरी कृष्णपक्ष के बाद याने पोर्णिमा के बाद आनेवाली एकादशी को
कृष्णपक्ष की एकादशी कहते है.

साल की सभी शुक्लपक्ष और कृष्णपक्ष में आनेवाली सभी एकादशी
अपना अलग अलग महत्व रखती है.

एकादसी व्रत, जानकारी, पूजन, सूची | All Ekadashi’s Name List

एकादशी व्रत का महत्व :-

हिंदू धर्म में एकादशी या ग्यारस एक महत्वपूर्ण तिथि है. और एकादशी
व्रत का भी बड़ा महत्व है. एक ही अवस्था में रहते हुए जिस भगवान में
आपकी आस्था हो उस भगवान की पूजा आराधना करने को प्रेरित
करनेवाले व्रत को एकादशी व्रत कहते है.

इस व्रत की महिमा पुराणों में भी बताई गयी है, भगवान शंकरजी के
उपदेशोंनुसार ग्यारस तिथि का एकादशी व्रत महान पुण्य फल
देनेवाला होता है.

पुराणों के अनुसार एकादशी व्रत हिन्दू धर्म के दुसरे व्रत, या हवन या कोई भी
पूजापाठ से अधिक फलदायी होता है. इस व्रत की एक दूसरी मान्यता
यह भी है की, जो भी एकादशी का व्रत करता है, तो इसके फलस्वरूप
उसके पूर्वज या पितरों को स्वर्ग की प्राप्ति होती है.

एकादशी व्रत के नियम :

एकादशी व्रत करने के नियम काफी कड़क होते है… इस व्रत को
कोई भी स्त्री या पुरुष या बालक – बालिका, बुजुर्ग अपनी इच्छा से कर
सकते है, इसमें कोई बंधन नहीं है. लेकिन जिसे भी यह एकादशी व्रत करना है
उसे एकादशी तिथि के पहले सूर्यास्त से लेकर एकादशी के अगले सूर्योदय तक
उपवास रखना पड़ता है.

साथ ही एकादशी के एक दिन पहले किसी भी तामसी और मासाहारी भोजन का
सेवन नहीं करना है. जैसे मास,अंडा, मछली,प्याज, शहद इस प्रकार की वस्तुओं
का सेवन नहीं करना है.

साथ ही व्रत पूरा होने तक पूर्ण रूप से ब्रह्मचर्य का पालन करना होता है.
इस दिन प्रयत्नशील रहना चाहिए की एकादशी व्रत के नियमों का पूरी
तरह से पालन हो और उसमें कोई भी गलती ना हो…!

एकादशी व्रत के नियम

एकादशी वाले दिन सुबह मंजन या दातुन ना करे, नींबू, आम, या जामुन के पत्तो को
चबाले लेकिन ध्यान रखना है उस दिन पेड़ के पत्तों का तोडना मना है, इसीलिए
पेड़ के निचे गिरे हुये पत्तो काही उपयोग करे, या फिर उस दिन साढ़े पानी से ही
कुल्ला कर ले. गला साफ करने के लिए अपनी उंगली का प्रयोग करे.

नहाकर स्वच्छ कपडे पहनकर मंदिर जाये, गीता का पाठ करे और
शुद्ध मन से ॐ नमो भगवते वासुदेवाय इस मंत्र जप करें और
विष्णु भगवान को याद करके उनकी प्रार्थना करें.

एकादशी के दिन दान-धर्म की भी विशेष महत्व है, इसीलिए अपनी
शक्तिनुसार दान जरूर करें.

एकादशी व्रत के नियम

एकादशी के बाद वाला दिन सामान्य दिन की तरह होता है, इस दिन सुबह
जल्दी उठकर स्नानादि से निवृत्त होकर, विष्णु भगवान की पूजा करते हैं
और सामान्य ही खाना को खाकर एकादशी व्रत को पूरा करते हैं.
इस दिन ब्राह्मणों को मीठा और दक्षिणा या शिदा देने का भी प्रचलन है.

वैसे एकादशी के दिन पूर्णता निराहार रहना है लेकिन यह हर किसी के लिए
संभव नहीं है… इसीलिए जो भी व्यक्ति एकादशी का व्रत करता है उसे,
एकादशी के दिन गेहूं, मसाले और सब्जियां इत्यादि का सेवन वर्जित होता है.

एकादशी व्रत का भोजन :-

शास्त्रों के अनुसार उपासक एकादशी के दिन ताजे फल, मेवे, चीनी,
कुट्टू, नारियल, जैतून, दूध, अदरक, काली मिर्च, सेंधा नमक, आलू,
और शकरकंद का प्रयोग कर सकते हैं.
एकादशी व्रत का भोजन सात्विक होना चाहिए.

एकादशी व्रत में क्या करना वर्जित है :-

एकादशी के दिन चावल का सेवन भी वर्जित होता है.
दुसरे का दिया हुआ अन्न आदि या दूसरा कुछ भी ना खाएं.
किसी भी पेड़ के पत्तों को ना तोड़े.

अपने घर में पेड़ ना लगाएं. ( ये इसीलिए किया जाता है, की अगर घर में
कोई भी पेड़ वगैरे लगाने से छोटी-छोटी चीटींया या अन्य छोटे- छोटे
जीवजंतुओं के मरने का डर होता हैं. और एकादशी के दिन जीव हत्या करना
पाप होता है.

एकादशी व्रत में क्या करना वर्जित है

बाल, नाख़ून ना स्वयं काटे और नाही कटवाएं.
कम से कम बोले, जब जरूरत हो तभी बोले, किसीको
अपशब्द न कहे, वाणीं दोष ना होने दे.

अगर फलाहार लेना चाहते है तो, गोभी, पालक, शलजम इत्यादि का
सेवन ना करें. सफरचंद, आम, केला, अंगूर, पिस्ता, बादाम, इत्यादि का
सेवन कर सकते है.

मन में किसी प्रकार का विकार न आने दें.

एकादशी व्रत की मुख्य आरती

एकादशी दिन पूजा करने के पश्चात् इस आरती को
अवश्य गाना चाहिए.

ॐ जय एकादशी माता, जय एकादशी माता

विष्णु पूजा व्रत को धारण कर, शक्ति मुक्ति पाता॥
॥ॐ जय एकादशी…॥

तेरे नाम गिनाऊं देवी, भक्ति प्रदान करनी
गण गौरव की देनी माता, शास्त्रों में वरनी॥
॥ॐ जय एकादशी…॥

मार्गशीर्ष के कृष्णपक्ष की उत्पन्ना, विश्वतारनी जन्मी
शुक्ल पक्ष में हुई मोक्षदा, मुक्तिदाता बन आई॥
॥ॐ जय एकादशी…॥

पौष के कृष्णपक्ष की, सफला नामक है
शुक्लपक्ष में होय पुत्रदा, आनन्द अधिक रहै॥
॥ॐ जय एकादशी…॥

नाम षटतिला माघ मास में, कृष्णपक्ष आवै
शुक्लपक्ष में जया, कहावै, विजय सदा पावै॥
॥ ॐ जय एकादशी…॥

पापमोचनी फागुन कृष्णपक्ष में शुक्ला पापमोचनी
पापमोचनी कृष्ण पक्ष में, चैत्र महाबलि की॥
॥ ॐ जय एकादशी…॥

चैत्र शुक्ल में नाम पापमोचनी, धन देने वाली
नाम बरुथिनी कृष्णपक्ष में, वैसाख माह वाली॥
॥ ॐ जय एकादशी…॥

शुक्ल पक्ष में होय मोहिनी अपरा ज्येष्ठ कृष्णपक्षी
नाम निर्जला सब सुख करनी, शुक्लपक्ष रखी॥
॥ ॐ जय एकादशी…॥

योगिनी नाम आषाढ में जानों, कृष्णपक्ष करनी
देवशयनी नाम कहायो, शुक्लपक्ष धरनी॥
॥ ॐ जय एकादशी…॥

कामिका श्रावण मास में आवै, कृष्णपक्ष कहिए
श्रावण शुक्ला होय पवित्रा आनन्द से रहिए॥
॥ ॐ जय एकादशी…॥

अजा भाद्रपद कृष्णपक्ष की, परिवर्तिनी शुक्ला
इन्द्रा आश्चिन कृष्णपक्ष में, व्रत से भवसागर निकला॥
॥ॐ जय एकादशी…॥

पापांकुशा है शुक्ल पक्ष में, आप हरनहारी
रमा मास कार्तिक में आवै, सुखदायक भारी॥
॥ॐ जय एकादशी…॥

देवोत्थानी शुक्लपक्ष की, दुखनाशक मैया
पावन मास में करूं विनती पार करो नैया॥
॥ ॐ जय एकादशी…॥

परमा कृष्णपक्ष में होती, जन मंगल करनी
शुक्ल मास में होय पद्मिनी दुख दारिद्र हरनी॥
॥ ॐ जय एकादशी…॥

जो कोई आरती एकादशी की, भक्ति सहित गावै
जन गुरदिता स्वर्ग का वासा, निश्चय वह पावै॥
॥ ॐ जय एकादशी…॥

एकादशी के नाम की सूची

जिस वर्ष अधिक मास होता है उस वर्ष पूरी २६ एकादशी होती है.
हर एक एकादशी की कथा और महत्व अलग अलग है.
उसका फल भी भिन्न भिन्न होता है.

• पौष पुत्रदा एकादशी
• षटतिला एकादशी
• जया एकादशी
• विजया एकादशी
• आमलकी एकादशी
• पापमोचिनी एकादशी
• कामदा एकादशी
• वरुथिनी एकादशी
• मोहिनी एकादशी
• अपरा एकादशी
• निर्जला एकादशी
• योगिनी एकादशी
• देवशयनी एकादशी
• कामिका एकादशी
• श्रावण पुत्रदा एकादशी
• अजा एकादशी
• परिवर्तिनी एकादशी
• इन्दिरा एकादशी
• पद्मिनी एकादशी
• परम एकादशी
• पापांकुशा एकादशी
• रमा एकादशी
• देवुत्थान एकादशी
• उत्पन्ना एकादशी
• मोक्षदा एकादशी

ॐ नमो भगवते वासुदेवाय नमः
जय श्री कृष्णा
जय भोलेनाथ

इमानदारीचे फळ- Motivational Story | प्रेरणादायक छान गोष्ट

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इमानदारीचे फळ- Motivational Story | प्रेरणादायक छान गोष्ट

ऑफिसमधुन परततांना रजनीने भाजीबाजाराच्या बाजूला गाडी थांबवायला
ड्रायव्हरला सागितले आणि रजनी गाडीतून उतरुन भाजीपाला घ्यायला
निघाली. तसे रजनीला ताजीतवानी भाजी घ्यायला खूप आवडायचे पण
जिल्हाधिकारी झाल्यापासून दरदिवशी वेळ काही मिळत नव्हता तरीही
जमेल तेव्हा रजनी भाजीपाला घ्यायला नक्कीच जायची.

त्या दिवशी भाजीच्या दुकानावर एक आठ-दहा वर्षाची गोड चेहऱ्याची मुलगी
बसली होती. भाजीचा घेऊन झाल्यावर रजनीने त्या भाजीवाल्या मुलीला पैसे दिले.
तेवढ्यातच तिचा फोन वाजला आणि ती बोलत बोलत आपल्या गाडीकडे निघाली.
गाडीजवळ काहीवेळ बोलली आणि फोन ठेवल्यावर ती गाडीत बसायला लागली
तेवढ्यात तिला मागून कोणीतरी स्पर्श केल्यासारखे जाणवले. चमकून तिने मागे
वळून पाहीले तर भाजीवाली मुलगी उभी होती.

रजनी म्हणाली, काय झाले… तुला पैसे तर मी दिले आहेत….
त्या मुलीने काही न बोलता पर्स पुढे केली… आणि म्हणाली
आपली हि पर्स दुकानातच राहिले होते…

रजनीने आपली पर्स हातात घेवून बघितले… पर्स मधील पैसे आणि
सगळी वस्तू बरोबर होती. रजनी ला त्या मुलीच्या इमानदारीचे फार
कौतुक वाटले.
धन्यवाद बेटा… तुझे नाव काय आहे…? अश्विनी…..
तेवढ्यात फोन वाजला आणि रजनी बोलता बोलता गाडीत बसून
निघून गेली. मुलीने गाडीला जातांना बगून ती आपल्या दुकानाकडे
निघाली.

इमानदारीचे फळ

रात्रीला जेवण झाल्यावर रजनी झोपायच्या तैयारीत होती तसाच अचानक तिला
त्या भाजीवाल्या मुलीची आठवण झाली… आणि तिला स्वतःचाच भूतकाळ
आठवायला लागला. माझ्यासोबत हि तर असेच झाले होते आणि त्या इमानदारीचे
फळ म्हणजे मी आज जिल्हाधिकारी आहे. घडलेली घटना रजनीच्या डोळ्यासमोर
यायला लागली.

अंदाजे 20 वर्षांपुर्वीची ही गोष्ट…. रजनी शाळा सुटल्यावर घरी जात असतांना
तिला रस्त्यावर, पैशाने भरलेला एक पाकीट पडलेला दिसला. तिने तो पाकीट
उचलून बघितले तर नोटांनी गच्च भरलेला होता, थोडा वेळ तर रजनी घाबरली….
तसाच तिला गुरुजीने शाळेत शिकविलेला ईमानदारीचे फळ गोड असते…
हा आठवलाच….

म्हणून…! ते पाकिट तिथेच टाकून द्यावे असे तिला वाटू लागले. काय करावे आणि
काय नाही या विचारात तिने आजूबाजूला बघितले तर जवळच रस्त्याच्या बाजूला
एक व्यक्ती आपल्या कार ला टेकून फोनवर बोलत होता… रजनी ला वाटले हा
पाकीट नक्की ह्या माणसाचाच आहे म्हणून ती त्याच्याजवळ जाऊन,
काका-काका म्हणत त्या माणसाचे लक्ष आपल्याकडे केले…

तो माणूस, ह्या मुलीने बोलण्यात अळथळा आणला म्हणून थोडा रागातच
बोलला काय आहे…? त्यावर रजनी ने पाकीट दाखवत म्हणाली काका हे
पाकीट तुमचे आहे काय…?

तो एकदम चमकून आपल्या खिशाला हाथ लावायला लागला…
हो.. हो… हे तर माझेच पाकीट आहे बेटा… तुला कुठे सापडले…
तिकडे पडलेले होते… त्या जागेकडे बोट दाखवत म्हणाली….
लगेच त्या माणसाने आपले पाकीट उघडून बघितले…
सगळे व्यवस्थितपणे पाहून पाकीट खिशात ठेवला…!

तोच मागून आलेल्या गाडीने हॉर्न वाजविला…. तर तो आपली गाडी
बाजूला करण्यासाठी गाडीत बसला आणि रजनी आपल्या घराच्या
रस्त्याला लागली.

चालता चालता रजनी खूप आनंदी होती… आपल्या इमानदारीचा तिला
अभिमान वाटत होता… तिला असे वाटत होते कि ती केव्हा घरी पोहचते
आणि आपल्या आईला हा सगळा प्रकार सांगेल…

रजनी घरी पोहोचताच आई-आई हाक मारायला लागली… तिची आई पोळ्या
करीत होती. शाळेचा दफ्तर बाजूला फेकत ती धावत आईजवळ गेली आणि
सगळा प्रकार आनंदाने सांगितला….

रजनीला वाटले होते कि आई तिला शाबासकी देईल, पण आईने पोळ्या करणे
सोडून उभी झाली आणि रजनी चा हात पकडून त्या लाटण्यानेच मारायला
लागली…

कारटे… घरी खायला काही नाही आहे आणि तुने हातातली लक्ष्मी फेकून दिली….
गरज काय होती तुला ते पाकीट परत करायची. रोडावरून उचलून सरळ
आपल्या दप्तरात टाकुन मुकाट्याने घरी यायला पाहिजे होते…
तुला कोणीही काही बोलू शकला नसता….
असे बोलत जायची आणि रजनीला मारत जायची.

इमानदारीचे फळ

रजनी जोरजोरात रडत होती…. आणि आईला “नको ना मारु आई”अशी
विनवण्या करत होती.आईच्या हातातल्या बांगड्या फुटल्या तेव्हाच
रजनीची सुटका झाली.

काही वेळातच तिचे बाबा घरी आले तेही दारू पिऊन होते…
रजनीचा रडवेला चेहरा पाहून त्याने काय झाले विचारले.
रजनीने काही सांगण्या आधीच तिच्या आईने सगळा
प्रसंग एका श्वासातच नवऱ्याला सांगितला…

रजनीला वाटले होते की वाटले बाबा नक्की तिला सहानभुती दाखवतील…
पण तिच्या बाबाने तिच्याच जवळ पडलेल्या दप्तरातील पट्टी काढली आणि
रजनीला मारायला सुरुवात केली…

रजनीला मारणे चालू असतांना तिचा लहान भाऊ एका कोपऱ्यात
थरथर कापत रडत होता. जणू काही त्याला, इमानदारी
दाखवल्यावर काय होते याचा धडाच त्याचे आईबाबा त्याला देत होते.

रजनीला मारुन थकल्यावर तिचा बाप दारुच्या नशेत बडबडत बसला.
मार खाऊन थकलेली रजनी जेवन न करता तसीच झोपून गेली.

दुसऱ्या दिवशी रजनीने घडलेला प्रसंग आपल्या शाळेतल्या मैत्रिणींना
सांगितला. तिच्यासारख्याच झोपडपट्टीत रहाणाऱ्या त्या मुली…
त्यांनी रजनीलाच दोषी ठरवले.

तीन दिवसांनी संध्याकाळी रजनी आपल्या झोपडीत अभ्यास करत असतांना
तिला बाहेर गाडी थांबल्याचा आवाज आला. पाठोपाठ दारावर टकटक
ऐकू आली. तिची आई दार उघडून बाहेर गेली. रजनी बाहेर ये. हे कोण
आलेत बघ….

घाबरता घाबरता रजनी बाहेर आली. समोर एका महागड्या कार जवळ
एक माणूस उभा होता. होय…! तोच तो माणूस ज्याला तिने पाकिट
उचलून दिले होते.

तिला पाहून तो हसला. हीच ती मुलगी… तो रजनीच्या आईला म्हणाला.
पोरी… त्या दिवशी तुझे आभार मानायचे आणि तुला बक्षीस द्यायचेही
राहून गेले. बोल काय पाहीजे तुला…?

रजनी ला काही कळेनासे झाले… एकदम ती भांबावल्या सारखी
बघू लागली… काय बक्षीस मागावे… हे काही तिला कळेना.
तोच रजनीच्या कानावर शब्द पडले….
आईस्क्रीम…! हो आईस्क्रीम….
मला आईस्क्रीम पाहीजे…..

रजनीच्या आधी तिचा बाहेर आलेला भाऊच आनंदाने ओरडला.
रजनीने ही हो मध्ये मान डोलावली.

त्यावर पर्स वाले काका म्हणाले… तर चला मग… बसा गाडीत…..
त्या महागड्या गाडीत बसायच्या कल्पनेनेच दोघे उत्साहित झाले
आणि पटकन गाडीत जाऊन बसले.

रजनीच्या आईने असमाधानाने त्यांच्याकडे पाहीले आणि मनातच
बोलायला लागली की या माणसाने… या आईस्क्रीम ऐवजी
पाचशे किंवा हजार रुपये बक्षीस म्हणून दिले असते तर
संसार चालवायला काही मदत तरी झाली असती…

त्या काकाने अगोदर दोघांना भेळ, पाणीपुरी घेऊन दिली.
त्या नंतर मनसोक्त आईस्क्रीम चारली… आणि त्यांना
घरी परत आणले…

ते जेव्हा घरी परत आले तेव्हा रजनीचे बाबा घरात बसले होते…
एका तुटलेल्या खुर्चीवर ते काका बसले आणि म्हणाले…
आपली मुलगी खूप इमानदार आणि चांगली हुशार ही आहे.
आता गाडीत बसल्या बसल्या मी तिला काही प्रश्न विचारले.
खुप छान उत्तरे दिली ह्या मुलीने. मला असे वाटत आहे की,
तिचे नाव तुम्ही एखाद्या चांगल्या शाळेत टाकावे.

साहेब, आम्ही बांधकामावर मजुरी करणारी माणसे.
आम्हाला ते कसे जमणार…? रजनीचे बाबा हात जोडत म्हणाले…

तुम्ही काही काळजी करु नका. रजनीच्या शिक्षणाची जवाबदारी
मी घेतो… सगळा खर्च मी करणार…. मात्र तिला या ठिकाणी
ठेवता येणार नाही… तिला आपण वसतीगृहात ठेवू…
त्याचाही खर्च मीच उचलणार.

इमानदारीचे फळ

रजनीच्या बाबाला असे वाटले की… चाला खाणारे एक तोंड कमी होणार..
म्हणून ते म्हणाले.. आम्हाला तर आनंद होत आहे… पोरीचे भले होत आहे…

त्या काकाने रजनीला सरकारी शाळेतून मोठ्या शाळेत टाकले…
आता रजनीचे फाटके कपडे आणि तुटक्या चपलांच्या जागी
नवीन इस्त्री केलेला कडक शाळेचा ड्रेस आणि चकचकीत बुट आले.
नवीन कोरी पुस्तके, आधुनिक शाळेचा दप्तर आला.

त्या पटापट इंग्रजी बोलणाऱ्या मुलांमध्ये गरीब रजनी दबकत होती…
तसेच हि मुलगी झोपडपट्टीतून आली आहे हे माहित झाल्यावर
बाकीची मुले मुली तिला टोचून बोलायचे. तिची टिंगल उडवायचे…

बिचारी रजनी कोपऱ्यात जाऊन रडत बसायची. पण हा प्रकार
लवकरच थांबला जेव्हा अर्धवार्षिक परीक्षेत रजनीचा पूर्ण वर्गातून
पहिला क्रमांक आला. यानंतर रजनीने काही मागे वळून पाहीले नाही.

सातव्या वर्गात स्काँलरशिप मिळवून रजनीने काकांवरचा
आपला भार थोडा कमी केला. दहावी बोर्डाच्या परीक्षेत ती पूर्ण
जिल्ह्यात प्रथम आली तेव्हा तिच्या आईवडिलांसोबत काकांनाही
फार आनंद झाला.

नंतर एका नामांकित काँलेजमध्ये त्यांनी तिचा प्रवेश करुन दिला.
बारावी बोर्डाच्या परीक्षेत तर रजनीने कमालच केली.
ती राज्यात प्रथम आली. ते कळताच काकांनी रजनीला मेडिकल
काँलेजमध्ये प्रवेश घेण्याविषयी सुचवले. पण तिला आय.ए.एस.
करायचे होते. तिचा निर्णय ऐकून काकांनी तिला विरोध केला नाही.

पदवी मिळवल्यावर रजनीने युपीएससीचा अभ्यास सुरु केला. कोणतेही
कोचिंग क्लासेस न लावता ती पहिल्याच प्रयत्नात पास झाली.
एक झोपडपट्टीतील मुलगी जिल्हाधिकारी झाली.

काकांना कळाल्यावर रजनीला सन्मानाने आपल्या घरी घेऊन गेले.
त्यांचा भव्य बंगला पाहून तिचे डोळे दिपून गेले. बंगल्यापेक्षाही
भव्य असलेल्या त्यांच्या मनाने रजनी भारावून गेली.

इमानदारीचे फळ

काकांनी तिची सगळ्या परिवाराशी ओळख करुन दिली. रजनी
माझी मुलगीच आहे असे ते सारखे म्हणत असतांना रजनीला
अश्रु अनावर होत होते.

तिच्या इमानदारीचे केवढे मोठे बक्षीस काकांनी तिला दिले होते.
तिच्या जिल्हाधिकारी बनण्याच्या आनंदात काकांनी रजनीच्या
पूर्ण वस्तीला जेवण दिले. आईवडिलांच्या तर आनंदाला
पारावर उरला नव्हता.

एक मुलगी शिकली की घरादाराचा स्वर्ग बनवते हे रजनीने सिध्द
केले होते.

नोकरीला रुजू झाल्यानंतर एका वर्षातच तिने आईवडिल आणि भावाला
त्या वस्तीतून बाहेर काढून एका चांगल्या घरात हलवले. भावाला चांगल्या
काँलेजमध्ये घातले. वयस्कर वडिलांना मजूरी सोडायला लावून दुकान
उघडून दिले.

सकाळी रजनी परत बाहेर निघालेली पाहून तिच्या पोलिस अधिक्षक
असलेल्या नवऱ्याला आश्चर्य वाटले.

आज सकाळी सकाळी कुठे…? नवऱ्याने विचारले
काल माझी पर्स इमानदारीने परत करणाऱ्या त्या मुलीला
आयुष्यभराचे बक्षीस द्यायला निघाली आहे…
हे सांगतांना रजनीच्या चेहऱ्यावर आनंदासोबतच
एक ठाम निश्चय दिसत होता.

इमानदारीचे फळ- Motivational Story | प्रेरणादायक छान गोष्ट

सबसे बड़ी समस्या | हिंदी प्रेरणादायक कहानी | Sunder Vichar | Hindi Story

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suvichar | हिंदी प्रेरणादायक कहानी | Sunder Vichar | Hindi Story

कुछ सालो से एक संतश्री गाँव के बहार आश्रम में रहते थे, अपने आश्रम में
नित्य प्रवचन करते.
गाँव वाले प्रवचन सुनने के लिए समय पे उपस्थित रहते थे. कुछ समस्या
हो तो संतश्री से सलाह लेते थे, गाँव में सभी संतश्री को बहुत मानते थे.

एक दिन संतश्री ने एक सप्ताह के लिए मौन धारण कर लिया… गाँव वालो ने
सात दिन तो जैसे – तैसे निकाल लिए लेकिन आठवे दिन पूरा गाँव संतश्री के
आश्रम में उपस्थित हो गया… आश्रम में जगह कम पड़ने लगी…!
संतश्री अपना मौन छोड़कर बाहर आये तो भीड़ देखकर आश्चर्य चकित हो गए…!

संतश्री आसन पर बैठे और सभी अपनी समस्या बताने लगे…
वह भीड़ इतनी हो गयी की कोई एक समस्या बताने लगता तो उसकी बात
पूरी होने से पहले ही कोई दूसरा अपनी बात सुरु कर देता…! सभी जल्दी से
संतश्री से अपनी बात कहना चाहते थे. कुछ ही देर में वहा का दृश्य बाजार के
जैसा हो गया…!

आखिर में संतश्री को जोर से कहना पड़ा, सभी शांत हो जाये और
अपनी – अपनी समस्याओं को एक कागज पर लिखकर दे…!

सभी ने अपनी – अपनी समस्याएं लिखकर संतश्री को दे दियें.
संतश्री ने सभी चिठ्ठी को एक डब्बे में डाल कर मिला दिया और बोले,
सभी इस डब्बे में से एक एक चिठ्ठी को उठाएगा और उसे पढ़ेगा.
उसके बाद उसे निर्णय लेना होगा कि… क्या वो अपनी समस्या को
इस समस्या से बदलना चाहता है…?

हर व्यक्ति एक चिठ्ठी उठाता … उसे पढता और डर जाता था .

एक -एक कर के सभी ने चिठ्ठीया देख ली पर कोई भी
अपनी समस्या के बदले किसी और की समस्या लेने को
तैयार नहीं हुआ.
सभी का यही सोचना था कि उनकी अपनी समस्या चाहे
कितनी ही बड़ी क्यों न हो बाकी लोगों की समस्या जितनी
गंभीर नहीं है .

दो घंटे बाद सभी अपनी-अपनी पर्ची हाथ में लिए लौटने लगे.
वे खुश थे कि उनकी समस्या उतनी बड़ी भी नहीं है जितना कि
वे सोचते थे .

मित्रो,
ऐसा कौन होगा जिसके जीवन में एक भी समस्या ना हो…? हम सभी के
जीवन में समस्याएं हैं…! किसीको आर्थिक समस्या है, किसी को मानसिक है,
तो कोई अपने स्वास्थ्य से परेशान है…! हमें इस बात को स्वीकार करना
चाहिए कि जीवन है तो, छोटी – मोटी समस्याएं आती ही रहेंगी.

ऐसे में दुःखी हो कर… निराश होकर उसी के बारे में सोचने से अच्छा है कि
हम अपना ध्यान उसके निराकरण में लगाएं … और अगर उसका
कोई समाधान ही ना हो तो दुसरे अपने जीवन के मार्ग पर ध्यान केंद्रित करें.

हमें ऐसा लगता है कि… सबसे बड़ी समस्या हमारी ही है, लेकिन विश्वास करें
इस दुनिया में लोगों के पास इतनी बड़ी – बड़ी समस्या… हैं कि हमारी समस्या
तो उनके सामने कुछ भी नहीं…! इसलिए भगवान ने जो भी दिया है, उसके लिए
भगवान का आभारी रहिये और एक खुशहाल जीवन जीने का प्रयास करिये…!

जय श्री कृष्णा
ओम् नम: शिवाय

आनेवाले कल की चिंता करने में
आज के आनंद को क्यों ख़राब करूँ…!
इस माटी ने जो रूप, रंग, रस, गंध दिए है…
उनका नाम ख़राब क्यों उसे करूँ…!

मैं हँसता हूँ, क्योंकि… हँसना मुझे आता है…!
मैं खिलता हूँ, क्योंकि खिलना मुझे भाता है…!
मैं मुरझा गया तो क्या…
कल फिर एक नया फूल खिलेगा…

ना कभी मुस्कान रुकी हैं, ना ही सुगंध…
जीवन तो एक सिलसिला है…
इसी तरह चलेगा…!
जो आपको मिला है उस में खुश रहिये…
और भगवान का धन्यवाद कीजिए.

क्योंकि आप जो जीवन जी रहे हैं…
वो जीवन कई लोगों ने देखा तक नहीं है…!
जिसका पालन पालना की तरह हो
उसके साथ भगवान सदा ही रहते है.
जिसको हम देख नही सकते…
लेकिन अनुभूति किया जा सकता है…!

जीवन ऐसे जीना चाहिए कि…
कोई अगर हँसे तो
हमारी वजह से हँसे…!
हम पर नही. और
अगर कोई रोए तो
हमारे लिऐ रोए…!
हमारी वजह से रोए नहीं…!

शमशान इस बात का साक्षी है की
भगवान की नजरों में
ना कोई बड़ा है ना कोई छोटा …
पर जीते जी इस बात को कोई नहीं समझता..

संसार में बहुत बार यह बात कहने
और सुनने को मील जाती है कि…
आदमी ने ज्यादा सीधा और सरल
नहीं होना चाहिए…
सीधे और सरल व्यक्ति का
हर कोई फायदा उठाता है.

एक कहावत भी कही जाती है कि…
टेढे पेड़ को कोई हाथ भी नहीं लगाता
और सीधा पेड़ ही काटा जाता है.
टेढ़े लोगों से संसार दूर भागता है…!
और सीधों को परेशान किया जाता है.

तो क्या फिर सहजता और सरलता को
छोड़कर कर टेढ़ा ही हुआ जाए…?
लेकिन यह बात जरूर समझ लेना की….
संसार में जितना भी रचनात्मक काम
हुआ है, वह टेढ़े लोगों से नहीं
सीधों से ही हुआ है.

अगर कोई भी सीधा पेड़ कटता है तो…
उस पेड़ की लकड़ी घर बनाने में
या घर सजाने में हीं काम आती है…!

मंदिर में भी
जिस शिला में से भगवान का
रूप प्रगट होता है वह टेढ़ी नहीं
कोई सीधी शिला ही होती है.
जिस बांसुरी की मधुर स्वर को सुनकर
हमें आंनद मिलता है…
वो भी किसी सीधे बांस के पेड़ से ही बनती है.
सीधे लोग ही कृष्णशंकर के प्रिय होते हैं…!

जीने का पाठ
पढ़ा रही है जिंदगी…
हमें हमारी सीमाएं
बता रही है जिंदगी…!

सारी उम्र वक़्त का रोना रोते रहे…
आज आईना दिखा रही है जिंदगी…!

प्रफुल्लीत होकर के स्वागत करें
इस सुनसान हुए रास्तों और
गलियों का…..
मौत से लड़ना सिखा रही है जिंदगी…!

ऐसा भी एक वक़्त जरूर आयेगा दोस्त…
जब तुम सभी से इस कठिन घडी को
बहुत प्रसन्न होकर सुनाएंगे…!

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समस्या को धनवान धन से…
बलवान बल से… ढोंगी तंत्र मंत्र से…
असहाय चाटुकारिता से…
और ज्ञानी युति से…
हल करने की सलाह देते हैं.
लेकिन समस्या हल करने से नहीं…
उस कारण का
अंत करने से ही समाप्त होती है.

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हमारी समस्या का समाधान
केवल हमारे पास है…!
दूसरों के पास तो केवल सुझाव है.

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समस्याओं का
अपना कोई आकार नहीं होता…!
वह तो सिर्फ हमारी सुलझाने की
क्षमता के आधार पर
छोटी या बड़ी होती है.

समस्या-hindi-suvichar-with-image-sunder-vichar-vb

धरती पर ऐसा कोई भी
व्यक्ति नहीं है… जिसको
कोई समस्या ना हो.
और धरती पर कोई समस्या
ऐसी नहीं है… जिसका कोई
समाधान नहीं.
मंजिल चाहे कितनी भी
ऊंची क्यों ना हो…
रास्ते हमेशा
पैरों के नीचे ही होते हैं. 

मेहनत-का-फल-hindi-suvichar-with-image-sunder-vichar-vb

मेहनत का फल…
और समस्या का हल…
देर से ही सही
पर मिलता जरूर है…!

परिस्थिति-समस्या-hindi-suvichar-with-image-sunder-vichar-vb

 

जब दिमाग कमजोर होता है,
तब… परिस्थितियां समस्या
बन जाती है.
जब दिमाग स्थिर होता है,
तब… परिस्थितियां चुनौती
बन जाती है.
लेकिन जब दिमाग मजबूत
होता है… तब परिस्थितियां
अवसर बन जाती है.

जीवन-की-हर-समस्या-hindi-suvichar-with-image-sunder-vichar-vb

 

जीवन की हर समस्या
ट्रैफिक की लाल बत्ती की
तरह होती है…! अगर हम
थोड़ी देर प्रतीक्षा कर ले…
तो वह हरी हो जाती है.
धैर्य रखिए… प्रयास करें…
समय बदलता ही है.
परिस्थितियां कभी भी
समस्या नहीं बनती.
समस्या तभी बनती है…
जब हमें परिस्थितिंयो से
निपटना नहीं आता.

आपकी-अच्छाई-hindi-suvichar-with-image-sunder-vichar-vb

 

अगर लोग आपकी अच्छाई को
आपकी कमजोरी समझने लगते हैं…
तो यह समस्या उनकी है,
आपकी नहीं. आप तो आईना हो,
आईना ही बने रहो…
फ़िक्र तो वो करें
जिनकी शक्लें खराब है.

 

Hindi Story | एक बहु ऐसी भी | हिंदी कहानी | Sunder Vichar

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Hindi Story | एक बहु ऐसी भी | हिंदी कहानी | Sunder Vichar

माँ जी ये पाच हजार रुपये, आप अपने पास रखिये.
यह बोलते हुए बहु ने सास को पाच हजार रूपये दिए
और बहु अपने ऑफिस के लिए निकल गयी.

सास का एकदम से गला भर आया, भरे गले से बोली…
बेटी, मुझे इतने पैसे का क्या काम है…!

माँ जी एक महिना हुवा है हमें इस नए घर में आए…
मै रोज देख रही हूँ… आपको कितनी चीजो के लिए पैसे लगते है…
आप सब्जी लेती हो, फल लेती हो… कामवाली भी कभी
आपको पैसे मांगती है, आप रोज सामनेवाले गार्डन में घुमने
जाती हो… आपका कुछ खाने का मन हुवा,
या कुछ खरीदने का मन हुवा तो…
आप ये पाच हजार रुपये अपने पास रखिये….

सास चहरे पे मुस्कुराहट लाते हुए बोली, पेंशन के पैसे रहते है मेरे पास…!
इस पर बहु बोली… माँ जी आप गार्डन में जाती है.. वहा आप फ्रेंड्स बनाये…
कभी मन हुवा तो पिक्चर देखने जाये… पार्टी दो… पार्टी करो…
अपनी जिंदगी खुलकर जियो माँ जी…!

इन्होने मुझे बताया की आपने बहुत मुश्किलें उठाते हुयें इस घर को संभाला हैं.
बड़े भैया अपने घर में खुश है… दीदी अपने ससुराल में खुश है, हम भी खुश है.

अब आप किसी की या कोई भी चिंता किये बगैर खुश रहे…
सिर्फ अपने लिए जियो… जो आपके मन में आये वो करो….

Sunder Vichar

मै जानती हूँ, आपने अपनी कितनी मुश्किले उठाई है, इस परिवार को
सँभालने के लिए… इस घर को बनाने में भी आपकी कई इच्छाओं का
गला घोटा गया. बस… जो हुवा सो हुवा…
अब आप सिर्फ और सिर्फ ख़ुद के लिए जियो…!

एक बहु ऐसी भी | हिंदी कहानी

बेटी इतनी छोटी उम्र में इतनी बड़ी बड़ी बातें कहाँ से सीखी तुने…?
माँ जी, जब मै 12 साल थी… तब एक दिन मेरी दादी बुवा के यहाँ
जा रही थी…! मेरी माँ ने दादी को पाच सौ रुपये उनके हाथ पर रखें .
और बोली वहा बच्चों को बाहर ले जाना… नानी की तरफ़ से कुछ
खानें-पिने पे खर्च करना, खिलौने लेकर देना.

दादी मम्मी के गले में लगकर रोने लग गई, और मैंने इतने पैसे आज तक
कभी भी दिल खोलकर ख़र्च किए ही नहीं… ऐसा बोलने लगी.
तब से मम्मी और दादी का व्यावहार आपस में अच्छी सहेलियों जैसा था…!

माँ जी मुझे ये भी पता लगा है की इस परिवार को सँभालने के लिए आपको
अपनी जॉब भी छोड़नी पड़ी, कितना बुरा लगा होगा आपको .
कितनी इच्छाओं महत्वाकांक्षाओं का दम घोटना पड़ा होगा…!
इसके बाद हर छोटी बड़ी बात के लिए आपको पति के सामने
हाथ फैलाना पड़ा होगा. तब पति भी उपकार कियें जैसे पैसे दिये करते थे…

माँ जी, आज से आप आपकी पेंशन को खर्च ना करे, पेंशन के पैसे
अपने पास ही रहने दीजिएगा. अगर मुझे कभी आवश्यकता लगी तो
मैं आपसे ही मांगूंगी…

बस्स बेटी… सब कुछ आज ही बोलेगी क्या… तुझे ऑफ़िस में देर हो रही है
जल्दी जा…
मुझे बोलने दो माँ… यह भी मै अपनी ख़ुशी के लिए ही कर रही हू,
मेरी माँ हमेशा कहती है कि १६-१८ घंटे घर में काम करने वाली महिला को
कोई समझता ही नहीं है. लेकिन तुम अपने सास की मेहनत को ध्यान में रखना…
प्यार बोओगी तो प्यार ही उगेगा…!

सास ने डबडबाई आँख से बहु को गले लगाया और आँखों से ओझल न हो
तब तक दरवाज़े में खड़ी रही.

बहू के आने पर मैं इस घर की चारदीवारी में बंध के रह जाऊँगी
ऐसे सोचा था. पर बेटी तूने तो दरवाज़ा खोलकर मुझे बाहर का
आसमान दिखा दिया…!

Sunder Vichar

किसी की बेटी हमारे घर की बहू है…
और हमारी बेटी किसी घर की बहू है.
हमारी बेटी के पास
वही लौटकर कर जाने वाला है
जो व्यवहार हम अपनी बहू के साथ करेंगे.

Hindi Story | एक बहु ऐसी भी | हिंदी कहानी | Sunder Vichar

 

Sunder Vichar | BUSY रहो लेकिन BE – EASY भी रहो | Suvichar

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Sunder Vichar | BUSY रहो लेकिन BE – EASY भी रहो | Suvichar

एक गिलहरी प्रतिदिन अपने काम पर समय से जाती थी और
अपना कार्य समय पर पूरा करके वापस अपने घर आती थी.

अपना कार्य गिलहरी पूरी मेहनत और ईमानदारी से करती थी.
गिलहरी बहुत कड़ी मेहनत करती थी क्योंकि… उस जंगल के
राजा शेर, जो गिलहरी का मालक था, उसने गिलहरी को जो
कार्य सोपा था वो पूरा होने पर शेर ने गिलहरी को 20 बोरा
अखरोट देने का वादा किया था.

काम करते हुए कभी अगर थक जाती तो आराम करने के लिए
बैठ जाती थी… लेकिन जैसे ही उसे 20 बोरी अखरोट देने का वादा
याद आता तो फिर काम को लग जाती थी…!

गिलहरी जब दूसरे गिलहरीयों को खेलते देखती थी,
तो उसका भी मन करता की मै भी इनके साथ खेलु.
लेकिन उसके आँख के आगे 20 बोर अखरोट आ जाते…!
और गिलहरी फिर अपने काम पे लग जाती थी.

इसी प्रकार समय बीतता गया, गिलहरी अपना काम मन लगाकर
करती रही… और वो समय भी आ गया, जब उसका काम
पूरा हो गया.

काम पूरा होने पर वादे के मुताबिक शेर ने गिलहरी को 20 बोरे
अखरोट देकर काम से मुक्त कर दिया…

Sunder Vichar | BUSY रहो लेकिन BE – EASY भी रहो

अब गिलहरी अखरोट के बोरों पास बैठ कर सोचने लगी की…
जीवनभर काम करते करते मेरे सारे दात घिस गए है…
अब इन्हें कैसे खाऊ….
अब ये अखरोट मेरे किस काम के…!

यह कहानी आज हमारे जीवन की सच्चाई बन गई है…!

इंसान नौकरी, व्यापार करके करते अपना पूरा जीवन पैसा कमाने में
लगा देता है… इस दौरान अपनी अनगिनत इच्छाओं का भी त्याग
कर देता है…!

एक इंसान 60 वर्ष आयु होने पर जब वो सेवा निवृत्त होता है…
तो उसे उसका जो जीवनभर जमा किया हुवा पैसा मिलता है…
या फिर जो भी उसका बैंक बैलेंस होता है… तो उसको उपयोग
करने की क्षमता खो चुका होता है…!

तब तक जमाना बदल चुका होता है…
परिवार का भार बच्चों पर आ जाता है…
और घर बच्चों के ही निर्णय से चलता है…!

अब सोचिए… क्या इन बच्चों को इस बात का अंदाजा भी
होगा की…. ये जीवनभर जमा किया पैसा या ये बैंक बैलेंस
करने के लिये……

हमने अपनी कितनी इच्छायें मारी होंगी…?
हमने कितनी तकलीफें उठाई होंगी…?
हमारे कितनें सपनें अधूरे रहे होंगे…?

जिस पैसे को पाने के लिए सारा जीवन लग जाये
और अंत में हम उसका उपयोग भी ना कर सके…
क्या फायदा ऐसे पैसे का… बैंक बैलेंस का…

Sunder Vichar | BUSY रहो लेकिन BE – EASY भी रहो

मित्रोँ…
आज तक इस पृथ्वी पर
कोई ऐसा अमीर अभी तक पैदा नहीं हुआ…
जो बीते हुए समय को खरीद सके…!

इसिलिये हर एक पल को खुश होकर जियो…
व्यस्त रहो… पर साथ में मस्त भी रहो…
सदा स्वस्थ रहो…!

जीवन में हर रोज भरपूर मौज लो….
अगर नहीं मिले तो खोज लो…! BUSY रहो लेकिन BE – EASY भी रहो…!

धन्यवाद

 

Sunder Vichar | BUSY रहो लेकिन BE – EASY भी रहो | Suvichar

 

हिंदी कहानी, अनपढ़ बेटा | दिल छु जाने वाली हिंदी कहानी, Story

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हिंदी कहानी, अनपढ़ बेटा | दिल छु जाने वाली हिंदी कहानी, Story

पटले जी पोस्ट मास्टर के पद से चार महीने पहिले रिटायर हुए.
एक महिना तो दोस्त, रिश्तेदार का खूब आना जाना रहा.

पिछले तीन महीने से तो सभी पटले जी घर का रास्ता
भूल गए, इसी बात को लेकर पटले जी दु:खी रहने लगे.

आज सुबह पटले जी ने पोस्टमेन को जाते देख उसे आवाज लगाई
और थोड़ी देर साथ बैठने की विनंती की, पोस्टमेन भी
अपने पुराने अधिकारी का मान रखने बैठ गए.

पटले जी की पत्नी गरमा गरम चाय लेके आयी. तीनो बाते करते हुए
चाय का आनंद ले रहे थे, तभी अचानक पोस्टमैन को कुछ काम
याद आया तो जाने की इजाजत मांगी तभी पटले जी
और उनकी पत्नी चेहरा उतर गया.

पोस्टमेन को समजते देर नहीं लगी, वो और कुछ देर
पटले जी के पास बैठे, उनके दुःख का कारण पूछा तो
उन्होंने सारी बात बतायी.

पोस्टमेन बोला, साहब यहाँ थोड़ी दुरी पर नगर निगम ने बहोत ही सुंदर
बाग बनाया है, वहा काफी बुजुर्ग आते है ,आप भी जाए और नए मित्र बनाये,
पटले जी को सुझाव काफी अच्छा लगा.

हिंदी कहानी | अनपढ़ बेटा

उन्होंने अगली सुबह का बड़ी ही बेसब्री से इंतजार किया, सुबह होते ही पत्नी
के साथ निकल पड़े मोर्निंग वाक पे, अब पटले जी की यही दिनचर्या हो गई,
कुछ नए दोस्त भी बने, कुछ साल निकल गए.

आज भी पटले जी नित्य की तरह पत्नी के साथ मोर्निंग वाक निकले थे की,
अचानक पीछे से आ रही एक लॉरी, पटले जी की पत्नी को टक्कर मार के
आगे निकल जाती है.

सर पे गहरी चोट लगने की वजह से खून बहुत तेजी से बहने लगता है,
बाजु में ही पार्क में टहल रहे कुछ लोग दौड़ के आते है और उनकी मदद से
पटले जी पत्नी को जैसे तैसे हॉस्पिटल में भर्ती करके अपने बड़े डॉक्टर बेटे को
फोन करके बताते है…

बेटा तुम्हारे माँ की हालत गंभीर है, कुछ पैसो की जरूरत है. और तुम्हारी माँ को
खून भी देना है. बेटा फ़ोन पे कहता है… पापा, मैं बहुत व्यस्त हूँ आजकल.
मै नहीं आ पाउँगा. मुझे विदेश मे बहोत बड़े हॉस्पिटल में नौकरी का पैकेज मिला है
तो उसी की तैयारी कर रहा हूँ. आपका भी तो यही सपना था ना…?

इसलिये हाथ भी तंग चल रहा है. पैसे की व्यवस्था कर लीजिए मैं बाद मे दे दुँगा.
अपने बड़े डॉक्टर बेटे के जबाब सुनने के बाद उन्होनें अपने दुसरे बेटे
जो की CA है, उसे फोन करते है तो, उसने भी आने से मना कर दिया.

उसे अपने व्यापारी ग्राहकों का अकाउंट सेट करना था. हाँ, बेटे ने इतना
जरुर कहा कि पैसों की चिंता मत कीजिए, मै भिजवा दूँगा.
यह अलग बात है कि उसने कभी पैसे नहीं भिजवाए……!

हिंदी कहानी | अनपढ़ बेटा

उन्होंने बहुत ही मायुसी से फोन रख दिया. अब उनका अपने तीसरे बेटे को
फ़ोन लगाने का मन नहीं कर रहा था, क्योकि वो अनपढ़ होने से पटले जी
उसे अनपढ़ समजते थे, और अनपढ़ को फोन करके से क्या फायदा…..!

जब ये दो शिक्षित बेटे कुछ नही कर रहे तो वो अनपढ़ क्या कर लेगा…..?

इन विचारो के साथ दुःखी मन से पत्नी के पास हॉस्पिटल में बैठ गए,
बैठे बैठे उन्हें पुराणी बाते याद आने लगी, पटलेजी को तीन बेटे और
एक बेटी थी. बडा डॉक्टर और दूसरा बेटा CA था. दोनौ की शादी
अच्छे पैसेवाले घर की लडकियों से हुई थी. दोनो अपनी पत्नियों के
साथ अलग अलग शहरों मे रहते थे.

बेटी की शादी भी उन्होंने बड़े ही धुमधाम से की थी.
तीसरा वाला छोटा बेटा पढाई में कमजोर था.
उसका मन पढाई में नहीं लगता था.
दसवी कक्षा में फेल होने के बाद उसने पढन बंद कर दिया
और घर पे ही रहने लगा.

पटले जी बहोत नाराज हुवे तो कहने लगा की मै घर में रहकर
आप दोनों की सेवा करूंगा. नाराज होकर उन्होंने उसका नाम
अनपढ़ रख दिया. दोनों बडे भाई पिता के आज्ञाकारी
थे, पर वह गलत बात पर उनसे भी बहस कर बैठता था….
इसलिये पटले जी उसे पसंद नही करते थे.

जब पटले जी रिटायर हुए तो जमा पुँजी कुछ भी नही थी.
सारी बचत दोनों बच्चों की उच्च शिक्षा और बेटी की शादी मे
खर्च हो गई थी.

उनका गाव में और पास के शहर मे भी एक घर था.
रिटायर होने के बाद पटले जी गाँव का घर और जमीन
छोटे बेटे को देकर शहर वाले घर में रहने चले गए,
घर का खर्च उनके पेंशन से चल रहा था.

हिंदी कहानी | अनपढ़ बेटा

कुछ दिनों बाद पटलेजी को जब लगा कि छोटा सुधरने वाला नही
तो उन्होंने बँटवारा कर दिया. और उसके हिस्से की जमीन उसे देकर
उसे गाँव मे ही रहने रहने दिया.

हालाँकि वह रहना नही चाहता था पर पिता की जिद के आगे झुक गया
और गाँव मे रहने लगा. पटले जी कभी भी छोटे बेटे का जिक्र भी
नहीं करते थे. दोनों बेटों की खुप तारीफ करते.
गर्व से अपना सिर ऊँचा करते.

बाबूजी बाबूजी सुन कर ध्यान टुटा तो देखा सामने वही अनपढ़ खड़ा था.
उन्होंने गुस्से से मुँह फेर लिया पर उसने बाबुजी के पैर छुए और रोते हुए बोला..
बाबूजी आपने इस अनपढ़ को क्यो नही बताया….?

खबर मिलते ही भागा आया हूँ. बाबूजी के विरोध के वावजुद उसने
अपनी माँ को एक बडे अस्पताल मे भरती कराया.
डॉक्टर ने ब्रेन का आपरेशन बताया.

माँ का सारा इलाज किया. दिन रात अपनी माँ की सेवा की, माँ जब
पूरी तरह ठीक हुई और लगा की अस्पताल से एक दो दिन में छुट्टी
हो जाएगी तो बेटा दो दिनों के लिए गाँव गया.

दो दिन बाद आकर, अस्पताल से छूट्टी लेकर माँ बाप को घर ले आया,
पटले जी ने खर्चे के बारे में पूछा तो बताया की वो धर्मार्थ अस्पताल था,
मुफ्त में इलाज हुवा है, जब माँ पूरी तरह ठीक हो गयी तो माँ बाप को
शहर वाले घर में छोड़कर छोटा बेटा अपने गावं लौट आया.

धीरे धीरे सब कुछ सामान्य हो गया. एक दिन यूँ ही उनके मन मे आया कि
उस नालायक की खबर ली जाए.

दोनों जब गाँव में पहुँचे तो घर पे ताला लगा था, पटलेजी ने सोचा की शायद
खेत में होगा.

दोनों खेत पहुचे, उनके खेत मे काम कर रहे आदमी से पुछा तो
उसने कहा… यह खेत अब मेरे हैं. क्या…? पर यह खेत तो….
उन्हे बहुत आश्चर्य हुआ. हाँ….! उसकी माँ की तबीयत बहुत खराब थी.
उसके पास पैसे नही थे तो उसने अपने सारे खेत बेच दिये.
वह रोजी रोटी की तलाश मे दुसरे शहर चला गया है.

पटले जी वापस गाव के घर मी आये, ताला तोड के अंदर प्रवेश किया तो,
उन्हे अनपढ़ कि याद आ गई…!

हिंदी कहानी | अनपढ़ बेटा

टेबल पर पडा लिफाफा खोल कर देखा तो उसमे रखा अस्पताल का
चौदा लाख का बिल उनको मुँह चिढाने लगा. अचानक उनकी आँखों से
आँसू गिरने लगे और वह जोर से
चिल्लाये – तु कहाँ चला गया अनपढ़….. अपने पापा को छोड कर.

एक बार वापस आ जा फिर मैं तुझे कहीं नही जाने दुँगा.
उनकी पत्नी के आँसू भी बहे जा रहे थे. और पटले जी को इंतजार था
अपने अनपढ़ बेटे को अपने गले से लगाने का…!
सचमुच वो पूरा अनपढ़ ही था.

हिंदी कहानी, अनपढ़ बेटा | दिल छु जाने वाली हिंदी कहानी, Story

Hindi Motivational Story | उपयोगिता और अनुपयोगिता का अंतर

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Hindi Motivational Story | उपयोगिता और अनुपयोगिता का अंतर

Hindi Motivational Story – 1

एक राजा का दरबार लगा हुवा था. अचानक एक संतश्री का राज दरबार में
आगमन हुवा.

राजा को संतश्री के आगमन से आनंद हुवा. राजा ने संतश्री का खुप आदर
सत्कार किया और कुछ दिन महल में ठहरने की विनती की. संतश्री ने
राजा की विनती मानते हुए एक महीने तक रूके. नित्य सत्संग हो रहा था.

संतश्री की सेवा में कोई कमी ना हों इसका राजा पुरा ख्याल रखता.
उन्हें महल की सभी छोटी मोटी वस्तु दिखाई गयी. और उस वस्तु की
जानकारी दी गयी. अच्छा दान देकर संतश्री को महल से विदाई
दी गयी.

Hindi Motivational Story

समय गुजरता गया. कुछ वर्षो के पश्चात संतश्री ने राजा को आश्रम में आने का
आमंत्रण दिया. राजा ने आमंत्रण का स्वीकार किया और समय पर पहुँच गये.

आतिथ्य के उपरांत संत श्री ने राजा को आश्रम की सभी छोटी बड़ी वस्तुओ को
दिखाना आरंभ किया. वैसे सस्ती और सामान्य वस्तुए देखने में राजा की
बिलकुल भी रूचि नहीं थी, लेकिन संतश्री का मान रखने के लिए उपेक्षापूर्वक
जैसे तैसे देखते रहे.

राजा जैसे ही ‘ आटा पिसने की हाथ की आटा चक्की ‘ की विशेषता जब बढ़ चढ़ के
बताने लगे… तब राजा की अरुचि जवाब दे गई और राजा ने कह दिया की
ये चक्की घर घर में होती है और एक दो रूपये में आसानी से मिल भी जाती है.
इसमें इतनी क्या विशेषता है…?

संतश्री गंभीर हो गए…! राजा से बोले… राजन आपके रत्न भी तो पत्थर के है…!
किसी काम के तो नहीं है… उलटे अपनी रखवाली भी कराते है. जब की
ये चक्की जीवन भर उपकार करती है. अनेको का पेट भरते रहती है.
रत्नराशी से इसका महत्व कई ज्यादा है. राजा का विवेक जगा और
वे उपयोगिता और अनुउपयोगिता का अंतर समझने लगे.

मशहूर होना पर….  मगरूर मत बनना.
साधारण रहना…. कमज़ोर मत बनना.

Hindi Motivational Story – 2

पहाडो के बीच में एक छोटासा गाँव बसा है, बाहर में तेज बारिश हो रही थी….
इस तेज बारिश में भी उस गाँव की स्कूल के एक कमरे के अन्दर क्लास
चल रही है.

पढ़ाते पढ़ाते टीचर ने बच्चों से पूछा की… बताओ बच्चो अगर मै तुम्हे मै
100 रुपये देता हु तो तुम उस 100 रुपये से क्या खरीदोगे…?
या 100 रूपये का तुम क्या करोगे…?
कोई बच्चे ने कहा की मैं वीडियो गेम खरीदुंगा….!
कोई बच्चा कह रहा था की मै क्रिकेट का बेट खरीदुंगा…..!
कोई बच्ची ने अपने लिए सुंदर गुडिया खरीदने की बात कही.
तो किसी ने कहा की मैं बहुत सी चॉकलेट्स खरीदुंगी…..!

सभी बच्चो पे टीचर ने नजर घुमाई, इन सारे बच्चे – बच्चियों में
एक बच्चा कुछ सोच में डूबा हुवा था.

Hindi Motivational Story

टीचर का ध्यान जाते ही टीचर ने पूछा की – तुम क्या सोच रहे हो….. ?
तुम बताओ क्या खरीदोगे….?
बच्चा बोला – टीचर जी मेरी माँ की नजर बहोत कमजोर हो गई है.
जिससे मेरी माँ को थोड़ा कम दिखाई देता है. इसिलीये अगर मुझे
100 मिलते है तो मैं तुरंत बाजार से अपनी माँ के लिए एक
चश्मा खरीदूंगा.

बच्चे की बात सुनकर टीचर ने पूछा – तुम्हारी माँ के लिए चश्मा तो
तुम्हारे पापा भी खरीद सकते है, तुम्हें अपने लिए कुछ नहीं खरीदना…?
इस पर बच्चे ने जो जवाब दिया उससे टीचर की आँखे
नम हो गयी और गला भी भर आया.

बच्चे ने कहा – टीचर जी…. मेरे पिताजी अब इस दुनिया में नहीं है.
मेरी माँ दूसरों के कपड़े सिलकर मुझे पढ़ाती है. और मेरी माँ को
आँखों से कम दिखाई देने की वजह से वो ठीक से कपड़े भी
नहीं सिल पाती है. इसीलिए मैं मेरी माँ को एक चश्मा देना
चाहता हुँ. जिससे मैं अच्छे से पढ़ सकूँ.
बड़ा आदमी बन सकूँ, और माँ को सारे सुख दे सकूँ….!

Hindi Motivational Story

टीचर बोले… बेटा तेरी सोच ही तेरी कमाई है…!
ये 100 रूपये मेरे वादे के अनुसार और ये 100 रूपये
और उधार दे रहा हूँ. जीवन में जब कभी कमाओ तो
लौटा देना. और मेरा आशीर्वाद है…
तू इतना बड़ा आदमी बने कि तेरे सर पे हाथ फेरते वक्त
मैं धन्य हो जाऊं…!

20 वर्ष बाद……..
तेज आवाज के साथ जोरो से बारिश हो रही है, और अंदर क्लास चल रही है….!
अचानक स्कूल के आगे जिला के कलेक्टर की लाल बत्ती वाली गाड़ी आकर रूकती है.
स्कूल का स्टाफ चौकन्ना हो जाता हैं…! साथ ही साथ पुरे स्कूल में सन्नाटा छा जाता हैं…!
मगर ये क्या…..?

कलेक्टर साहब एक वृद्ध टीचर के पैरों में गिर जाते हैं…. और कहते हैं….!
सर मैं……. उधार के 100 रूपये लौटाने आया हूँ….! पूरा स्कूल का स्टॉफ
स्तब्ध हो जाता है…!

वृद्ध टीचर झुके हुए नौजवान कलेक्टर को उठाकर भुजाओं में कस लेता है…
और रो पड़ता हैं…!

Hindi Motivational Story

दोस्तों….

मशहूर होना… पर मगरूर मत बनना.
साधारण रहना… कमज़ोर मत बनना.
वक़्त बदलते देर नहीं लगती…
शहंशाह को फ़कीर… और
फ़क़ीर को शहंशाह बनते… देर नही लगती …